मैं कोई बड़ा राइटर नहीं हूँ, न ही बहुत पढ़ने का शौक़ीन। सच बताऊँ तो कभी सोचा भी नहीं था कि ज़िंदगी में किताब लिखूँगा। पर ये कहानी इतनी अंदर तक महसूस हुई कि जब तक इसे लिख नहीं दिया, मन को सुकून ही नहीं मिला।
“गुलमोहर” मेरी पहली कोशिश है — और ये मैंने किसी प्रोफेशनल राइटर की तरह नहीं, बस एक आम इंसान की तरह लिखा है, जिसने वो सब कागज़ पर उतारा जो दिल में चल रहा था। ये कहानी दो-तीन महीने में बनी, कई रातों की नींद उड़ाकर, जब आरव और सिया की बातें दिमाग़ से निकल ही नहीं रही थीं।
मैंने कोई रूल्स फॉलो नहीं किए, न परफेक्शन के पीछे भागा। बस जो दिल ने कहा, वही लिखा। शायद यही वजह है कि “गुलमोहर” कुछ अलग है — सच्ची, सीधी और पूरी तरह दिल से निकली हुई।
— राकेश कुमार सिसोदिया